हापुड़ में वकीलों पर लाठीचार्ज का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट महालक्ष्मी पावनी ने इसपर कड़ा विरोध दर्ज किया है. महालक्ष्मी पावनी ने कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस के द्वारा यह एक तरह का संवैधानिक गतिरोध उत्पन्न करने वाला क्रिया-कलाप माना जा सकता है क्योंकि हापुड़ में वकीलों के द्वारा अपनी माँगों के समर्थन में शांति पूर्ण ढंग से सिर्फ धरना-प्रदर्शन ही किया जा रहा था।
मुख्य मांग, तथाकथित मनगढंत तरिके के एक महिला वकील के विरुद्ध किए गए एफआईआर के सिलसिले में सही बात की जांच कर उसे निरस्त करने केलिए थी जिसकी न्यायिक समीक्षा कर उत्तर प्रदेश की पुलिस और प्रशासन को उचित न्यायिक कदम उठाना चाहिए था न कि, वकीलों के साथ वैसा अनुचित, अपमानजनक और बर्बर व्यवहार करना। विगत कई सालों के अनुभव से यही संज्ञान में आता है कि वकीलों के साथ ऐसी बुरी घटनाएं खासकर उत्तर प्रदेश में एक आम सी घटना और बातें होकर रह गई हैं जिसकी पुनरावृत्ति है, हापुड़ और गाजियाबाद की यह ताजी घटना।
स्मरण रहना चाहिए कि हमारे देश में वस्तुतः प्रथमतः शासन, संविधान और कानून का है न कि किसी राजनीतिक पार्टी अथवा व्यक्ति का। अत: जो वकील समाज न्यायिक व्यवस्था के अंतर्गत संविधान और कानूनों की समीक्षा कर लोगों से पालन करवाता और स्वयं भी करता है, ऐसे वकील समाज के प्रति सिर्फ प्रांतीय ही नहीं, राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान की भावना होनी चाहिए न कि इस तरह का अपमानजनक व अमानवीय व्यवहार। डंडे के जोर से वकील समाज को कदापि नहीं चलाया या मजबूर किया जा सकता है।
हापुड़ और गाजियाबाद की इस गैरकानूनी और अनैतिक घटनाओं की जितनी भी निंदा की जाए, कम है। उत्तर प्रदेश सरकार को हापुड़ के इस अति निंदनीय घटना की सघन जांच कर सभी संबंधित दोषी प्रशासनिक और पुलिस बल पर समुचित न्यायिक कार्यवाही कर ऐसा उदाहरण पेश करना चाहिए जिससे भविष्य ऐसी घटनाओं की पूर्णावृति नहीं हो।